कोंकण हमेशा मुझे मोहित करता रहा है, शायद यही कारण है कि मैं एक और अवसर की तलाश में था कि फिर से जा सकूं। पिछले बार जब हम गुहागर, हेदवी, और वेल्नेश्वर गए थे, उस यात्रा के ब्लॉग के लिंक नीचे दिए गए हैं। यदि आप कोंकण क्षेत्र में अन्य स्थलों के बारे में जानना चाहते हैं, तो आप उन लिंक पर क्लिक करके मेरे ब्लॉग पढ़ सकते हैं।
“Mumbai to Guhaghar Road Trip – Konkan Calling Part 1” – Aashish Chawla
Konkan Road Trip Part 2 – Guhaghar to Dapoli with Beaches, Forts & Family Fun – Aashish Chawla
स्वतंत्रता दिवस की छुट्टी और हमारी कोंकण यात्रा
स्वतंत्रता दिवस पास ही था, और इस बार किस्मत ने बोनस भी दे दिया – लंबा वीकेंड! अब आप मुझे जानते हैं, “लॉन्ग वीकेंड” सुनते ही मेरे पाँव अपने-आप थिरकने लगते हैं और बैग तो जैसे अपने-आप पैक होना शुरू कर देता है। रोज़मर्रा की ज़िंदगी से बाहर निकलने और कुछ नया खोजने का ख्याल इतना हावी था कि इस बार तो कहीं जाना ही था। मन में केवल एक ही गाना का बज रहा था वह अनिल कपूर की फिल्म मशाल फिल्म का , लिए सपने निगहाओं में ,चला हूँ तेरी रहो में, ज़िन्दगी आ रहा हूँ मैं।
मानचित्र पर इधर-उधर घूम-घूम कर जब जगहें तय कीं तो समझ आया कि ज़्यादातर जगहों पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट से आसानी से पहुँचा नहीं जा सकता। तो फिर क्या था, थोड़ा-सा घरेलू “नेगोशिएशन” करने के बाद तय हुआ – कार ही बुक करनी पड़ेगी। ( असल में हम पति -पत्नी को पब्लिक ट्रांसपोर्ट में घूमने का एक अलग ही लेवल का नशा है ) पर फिर सोचा , यार अपने साथियो को बसें बदल बदल कर भगाने में क्या मजा , तो आखिर में यह बात समझ में आगयी की , स्वतंत्रता दिवस का असली मज़ा अपनी सवारी से ही आता है! फिर एक गाना कण में बजने लगा मनु भाई गाड़ी चली पम पम
कार बुक हो गई तो अगला काम था सेना तैयार करना… ओह, मेरा मतलब है मेरे सहयात्री! इस बार हमारी छोटी-सी टुकड़ी में चार सदस्य थे।

जैसा हमेशा होता है, मेरी पत्नी ममता साथ थी। सच कहूँ तो हर सफर में (और ज़िंदगी में भी) वही मेरी असली ताक़त है। सफर में तो वह मेरी “ह्यूमन गूगल ड्राइव” होती है – कौन-से बैग में केबल हैं, स्नैक्स कहाँ छिपे हैं या वो गुम हुए मोज़े कहाँ मिलेंगे – सब उसे ही पता रहता है। उसके बिना मैं तो आधा समय यही चिल्लाते निकाल दूँ, “ममता, ये देना! ममता, वो कहाँ है? ममतााा!”
फिर आईं बीना दीदी – हमारे ग्रुप की सबसे सुलझी और सधी हुई शख़्सियत। लेकिन उनके शांत स्वभाव को देखकर धोखा मत खाइए। शरारत होते ही आप उन्हें सबसे आगे पाएँगे, और हमारी मस्ती के बीच उनकी खिलखिलाहट सबसे गूँजदार होती है।
और अब बारी आती है सरिता की – हमारी टीम की जान! उनकी हँसी इतनी संक्रामक है कि आसपास कोई संन्यासी भी बैठे हो तो वह भी मुस्कुरा दे। मज़ेदार बात ये है कि मज़ाक वो हमेशा खुद नहीं करतीं, लेकिन उनके फटाफट जवाब असली पंचलाइन से ज़्यादा मज़ेदार होते हैं।

तो इस तरह “दोस्तों का झुंड” तैयार था और हमने कोंकण की ओर रुख़ किया। योजना? तीन दिन की। पहला दिन थोड़ा ज़्यादा ही महत्वाकांक्षी था – दो मंदिर, एक बावड़ी और एक बाँध। रूट जो तय हुआ , वह था – दादर–माणगांव–चिपलून–संगमेश्वर।

सुबह-सुबह अटल सेतु पार किया। चारों के लिए ये पहला अनुभव था, तो फोटो-वीडियो ऐसे बन रहे थे जैसे हम ही सेतु का उद्घाटन करने आए हों। मैंने मज़ाक में कहा – “लो भाई, अटल सेतु और एलीफैंटा गुफाएँ, दोनों एक ही टिकट में!” मुफ्त मुफ्त मुफ्त
रास्ते भर रेडियो पर पुराने गाने, बारिश की फुहारें और स्नैक्स का स्टॉक चलता रहा। बीच में हम इंदापुर , जो माणगांव से कुछ पहले आता है वहां पर नाश्ते के लिए रुके । होटल वाले ने ऐसा चेहरा बनाया जैसे हमने “फास्ट फूड” नहीं बल्कि रामायण का पूरा प्रसंग माँग लिया हो। पोहा और भजिया आने में आधा घंटा! मैंने सोचा – “अगर इतना ही इंतज़ार करना था तो मुंबई में ही वड़ा पाव खा लेते।” फिर ”सोचा – चलो टाइम गया, पर पेट तो बढ़िया भर गया।”

.
ड्राइवर बनाम एस.टी. बस
खाना खाकर चले ही थे कि ट्रैफिक जाम में फँस गए। हमारे ड्राइवर को अचानक लगा कि वो “फास्ट एंड फ्यूरियस – कोंकण ड्रिफ्ट” का हीरो है। गलत साइड से गाड़ी निकाल दी।और फिर सामने से सीधी एस.टी. बस!
उस ड्राइवर की जो घूरने वाला लुक्स दिया … भाई, मेरी तो रूह काँप गई। लगा अगले दिन की हेडलाइन यही होगी – “वीकेंड वांडरर एस.टी. बस के नीचे।” खैर, हमारे ड्राइवर को सबक मिल गया – उसके बाद कोई हीरोगिरी नहीं की उसने ।

.
जब हम चिप्लून की ओर बढ़ रहे थे, मेरी नजर दूर की पहाड़ी पर बाईं ओर खोदी गई गुफाओं के एक समूह पर पड़ी। जिज्ञासु होकर, मैंने जल्दी से गूगल मैप्स चेक किया और पता चला कि ये गांधारपाले बौद्ध गुफाएं थीं। दृश्य आकर्षक था, और एक पल के लिए मैंने चाहा कि मैं एक मोड़ ले सकूं। लेकिन चूंकि उस दिन का हमारा कार्यक्रम पहले से तय था, मैंने अपने आप से चुपचाप वादा किया – मैं निश्चित रूप से एक और बार इन प्राचीन गुफाओं की खोज करने वापस आऊंगा।

.
श्री रामवर्दायनी मंदिर – चिपलून
हम लोग अपने पहले गंतव्य श्री रामवर्दायनी मंदिर पहुँचे करीब 2 बजे और हम जैसे ही श्री रामवर्दायनी मंदिर के सामने पहुँचे, बारिश थम गई। बिल्कुल VIP ट्रीटमेंट बॉस ! दिल से एक ही आवाज़ निकली गॉड जी तुस्सी ग्रेट हो !

.
श्री रामवर्दायनी मंदिर बहुत ही शांत और सूंदर मंदिर है , यहाँ देवी रामवर्दायनी की पूजा होती है, जिन्हें तुलजाभवानी का अवतार माना जाता है।

मान्यता है कि उन्होंने लंका जाते वक्त भगवान राम को आशीर्वाद दिया था। शांत वातावरण, सह्याद्रि की गोद और मंदिर का बगीचा – अद्भुत अनुभव। यहाँ से भी निकल निकलते बारिश शुरू हो गयी थी लेकिन हम अपने पड़ाव के लिए निकल पड़े।

कोलकेवाड़ी डैम – प्लान बी
हमारा अगला पड़ाव था कोलकेवाड़ी डैम। लेकिन डैम वाले गेट बंद थे, तो पानी का नज़ारा जो हम देखने आये थे वह हमे देखने नहीं मिला। हमने भी बोला ओह यार कोई बात नहीं, हम तो हम हैं – प्लान बी रेडी है । ( जब हम कोलकेवाड़ी डैम आ रहे थे तब रस्ते में मैंने एक नदी देखि थी तो मन में एक विचार आया था की वापसी में जब यहाँ से गुजरेंगे तो यहाँ रूककर मस्त एक फूट शूट करेंगे और लंच का मजा भी नदी किनारे करेने का कोशिश करेंगे)

, बस अब क्या था हम जैसे ही नदी के पास आये हमने वहीं गाड़ी रोकी और निकाल लिए ममता के हाथ के बने पराँठे। नदी किनारे फोटो, ठहाके और पराँठे – पूरा पिकनिक मूड। सरिता बोली, “वीडियो बनाते हैं – ये हम, ये हमारे पराँठे और ये हमारी पार्टी!”

.
अब जब सब पार्टी करने में इतने तल्लीन हो गए तो मुझे ,जैसे सरिता और बीना दीदी बोलते है झुंड निरीक्षक की भूमिका में आ जाना पड़ा और सब को पकड़ पकड़ में गाड़ी में ठूसना पड़ा , कि देवियों ! अब बस करो वरना आगे लेट हो जायेंगे। हम अब जल्द ही यहाँ से संगमेश्वर के लिए प्रस्थान कर गए। हमारा अगला पड़ाव करीब करीब १. ३० घंटे बाद श्री कर्णेश्वर मंदिर का था।

.
कर्णेश्वर मंदिर – मौसम ऑन डिमांड
कर्णेश्वर मंदिर, चालुक्य काल का कम से १००० साल पुराना प्राचीन मंदिर हैं । यहाँ तक पहुँचने में हमे लगातार बारिश ज़ोरों से मिली थी, सोचा दर्शन नहीं हो पायेंगे ।

.
लेकिन जैसे ही हम मंदिर पहुँचे , एक करिश्मा हुआ – बारिश बंद। हम लोगो अच्छे से मंदिर देख पाये और भोलेनाथ जी के सूंदर दर्शन का भी आनंद मिल गया ,

‘
हल्का हल्का अँधेरा होने लगा था और मंदिर से बाहर निकलते ही फिर बारिश चालू हो गयी । सच में, आजदिन मौसम सिर्फ हमारे हिसाब से चल रहा था। मानो जैसे पूरा मौसम ऑन डिमांड हो।

.
सप्तेश्वर मंदिर Stepwell
हमारा अगला पड़ाव सप्तेश्वर मंदिर, जो संगमेश्वर तालुका में स्थित है, भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन और अत्यंत पूजनीय धाम है। यह मंदिर सोनवी और शास्त्री नदियों के संगम पर बसा हुआ है और कोंकण क्षेत्र का एक प्रमुख धार्मिक स्थल होने के साथ-साथ महाराष्ट्र की प्राचीन मंदिर वास्तुकला का उत्तम उदाहरण भी है। यह स्टेपवेल बहुत सुनसान सी लगी ,और रख रखाव की कमी महसूस हुई.

हम लोग जब तक यहाँ पहुंचे रौशनी काफी कम हो गयी थी , समय शाम ७ बजे थे , पर हमने भी यह ज़िद पकड़ ली थी की आज के दिन के सब स्पॉट पुरे कर के मानेंगे, सो हम हलकी हलकी बारिश में यहाँ पहुँच ही गए.
कुंड को अच्छे से देखा महादेव को प्रणाम किया और मंदिर से जल्दी जल्दी निकल गए की इस से पहले नाग देवता हमे गेस्ट अपीयरेंस देने आ जाये , जंगल में बसे इस मंदिर को सुनसान अवस्था में , ढलती रौशनी में देखने का अपना ही रोमांच था. बात जब रोमांच की निकली है तो बता दूं , इस मंदिर से बाहर निकलते ही जो हमारे साथ होने वाला था वह अब क्या बोलूं

गूगल मैप्स – हॉरर शो
सप्तेश्वर मंदिर से बाहर निकलते ही यह सोचा कि चलो आज का दिन खत्म हुआ , अब होटल चलते हैं। लेकिन गूगल मैप्स ने कुछ और ही सोचा – “नहीं-नहीं, अभी असली रोमांच बाकी है। बेटा किधर चला तू ”
कम्बख्त गूगल भाई ने हाईवे का रास्ता न बता कर हमें शॉर्टकट में घुसा दिया –जो सीधा घने जंगल के भीतर से गुजरता था ।

शुरू में लगा – “चलो, एडवेंचर ही सही।” लेकिन जल्दी ही सड़क मिट्टी के गड्ढों और टायर के निशानों में बदल गई। बारिश आँख-मिचौली खेल रही थी, पेड़ ऐसे झुक रहे थे जैसे कोई साजिश कर रहे हों, और हेडलाइट्स मानो अँधेरे में बुझती मोमबत्तियाँ।क्यों की हेडलाइट्स की रोशनी अँधेरे को रोकने के लिए बहुत कमज़ोर पड़ रही थी।
मेरे हाथ सीट बेल्ट पर जकड़े हुए थे, दिल गणपति महोत्सव में बजनेवाले ढोल के बेस से भी तेज़ धड़क रहा था। हर टहनी के टूटने की आवाज़ लग रही थी जैसे कोई हमें देख रहा हो। दिमाग में गणित चल रहा था – “पेट्रोल कितना है? अगर गाड़ी बंद हो गई तो? नेटवर्क तो है ही नहीं ? अगर भूतनी आयी तो?” (हाँ, डर में इंसान कोई भी मूर्खता सोच सकता है 😅)” इन सबको कहाँ पता था कि आगे बैठा ड्राइवर और मैं डर के मारे सीट बेल्ट को ऐसे पकड़ रखा था जैसे वही हमारा ताबीज़ हो।
और पीछे कार में ? पूरा कॉमेडी क्लब!
सरिता ने भूतों को लिफ्ट देने वाला मज़ाक सुनाया, बीना दीदी और ममता ठहाकों से लोटपोट हुए जा रहे थी – जैसे हम पिकनिक पर निकले हों। उन्हें क्या पता, मेरे दिमाग में राम गोपाल वर्मा की हॉरर फिल्म चल रही थी!
फिर आया असली झटका – सड़क खत्म। चारों तरफ घना जंगल, सामने डेड-एंड। इतनी गहरी ख़ामोशी कि अपनी साँस भी गड़गड़ाहट लग रही थी। एक पल को मुझे अख़बार की हेडलाइन दिखी – “वीकेंड वांडरर और साथी गुम… आखिरी बार गूगल मैप्स पर देखे गए।”
कोई चारा नहीं था। गहरी साँस ली, चुपचाप प्रार्थना की और धीरे-धीरे गाड़ी रिवर्स की। हेडलाइट्स पेड़ों पर भूतिया परछाइयाँ डाल रही थीं। हथेलियाँ पसीने से भीगी थीं, और पीछे लेडीज़ अब भी हँस-हँसकर मेरी घबराहट का मज़ा ले रही थीं।
आखिरकार, हम वापस हाईवे पहुँच गए। और जब सामने से एक धूल-भरी एस.टी. बस आती दिखी, तो यकीन मानिए – ऐसा लगा जैसे भगवान के ही दर्शन हो गया हो। राहत वैसी ही थी जैसे बरसात में गरम चाय की चुस्की।
रास्ते में पहला ढाबा मिला, वहीं खाना खाया और रात 9:30 बजे होटल पहुँच गए। उस रात मैं लकड़ी की तरह सोया – शुक्रगुज़ार कि हमारी “गूगल मैप्स हॉरर स्टोरी” हँसी-मज़ाक में खत्म हुई, अखबारों में नहीं।
दोस्तों जल्द ही मिलते है इस ब्लॉग के अगले भाग के साथ



