मेरे पिछले ब्लॉग में आपने पढ़ा कि किस तरह से हमारा एक छोटा सा हादसा हुआ, जिसके कारण हमें पहले दिन चित्तौड़ढ़ किले की यात्रा को छोड़ना पड़ा और हमने केवल सांवरिया मंदिर के दर्शन किए।

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सांवरिया मंदिर

 

 

दूसरा दिन

21 फरवरी, 2021

आज सुबह जब मैं उठा, तो कल की घटनाओं के कारण मैं थोड़ा परेशान था। मैंने अपनी पत्नी से पूछा कि वह कैसा महसूस कर रही है। पत्नी ने उत्तर दिया ” कल से दर्द आज कम है” इसका मतलब दर्द निवारक दवा ने अपना काम कर दिया लगता है, लेकिन मेरा मानना है कि दर्द निवारक दवाओं के माध्यम से राहत भ्रामक हो सकती है, इसलिए मैं अपनी पत्नी के साथ चित्तौड़गढ़ किले पर चलने का जोखिम नहीं उठा सकता था । हम दोनों ने फैसला किया कि हम एक ऑटो किराए पर लें तो बेहतर होगा और मेरी पत्नी या तो ऑटो में या एक जगह बैठकर स्मारकों का आनंद लेगी और मैं जाऊंगा और स्थानों की तस्वीरें क्लिक करूंगा। यात्रा में हमें स्थितियों के अनुसार समायोजित करना  पड़ता हैं।

चित्तौड़गढ़ किला 

 

 होटल से हम ऑटो बैठकर चित्तौड़गढ़ किले कि ओर निकल पड़े,  थोड़ी ही देर में हम किल्ले की ओर ऊपर चढ़ती घुमावदार सड़क से ऊंचाई पर पहुँचने  लगे। हमारा ऑटो कई गेटों से होकर गुजरा। हमारा ऑटो चालक अब  हमारे यात्रा गाइड बन चुका था , मुझे सूचित किया कि इस किले में 7 द्वार हैं और स्थानीय लोग इन्हें पोल ​​कहते हैं। इन सातों द्वारों के नाम पड़न पोल, भैरो पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोदल पोल, लक्ष्मण पोल और मुख्य द्वार राम पोल (भगवान राम का द्वार) के रूप में जाने जाते हैं। किले के सभी प्रवेश द्वार को सैन्य सुरक्षा के लिए सुरक्षित किलेबंदी के साथ बड़े पैमाने पर पत्थर की संरचनाओं के रूप में बनाया गया है। हाथियों और तोप के गोलों को रोकने के लिए फाटकों में नुकीले मेहराब थे। फाटकों के ऊपर  हिस्से में  धनुर्धारियों के लिए दुश्मन सेना पर गोली चलाने के लिए पैरापिट्स को उकेरा है। किले के भीतर एक गोलाकार सड़क सभी फाटकों को जोड़ती है और किले में कई स्मारकों (खंडहर महलों और 130 मंदिरों) तक पहुंच प्रदान करती है। 2013 में इस किले को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया था।

महाराणा कुम्भा पैलेस

 

40 रुपये प्रति व्यक्ति टिकट खरीदने के बाद हमने चित्तौड़गढ़ किले के परिसर में प्रवेश किया और हमने जो पहला पैलेस देखा, वह किले के सबसे विशाल पैलेस में से एक था और यह महाराणा कुंभा पैलेस कहलाता है। हम रैंप से चढ़कर महल  के  एक विशाल आंगन में आ गए, जिसमें घोड़े और हाथी के लिए अस्तबल है। आंगन बहुत  बड़ा था आकार  में। 

महाराणा कुंभा पैलेस में घोड़ों के लिए अस्तबल

 

 

जब मैंने आंगन के चारों ओर देखा तो मैं उस जगह की सुंदरता पर मोहित हो गया। महाराणा कुंभा पैलेस आज खंडहर की स्थिति में है, फिर भी इसकी भव्यता का अहसास आज  भी होता है।

 

सुबह होने के नाते, महल में मेरे और मेरी पत्नी के अलावा कोई नहीं था। जरा सोचो ,पूरे पैलेस में  आप ही हैं ,पूरा  पैलेस आपका  है , सोचकर ही मन झूम उठता है । 

 आज तो मुझे साला राजा जैसा महसूस हो रहा है

 

अकेले खुद के लिए पूरे महल का आनंद लेते हुए मेरी पत्नी

 

मैंने अपनी पत्नी को एक जगह पर बैठाया और मैं अकेले ही महल में घूमने लगा। मैं संकरे रास्ते से गुजरते हुए एक कमरे से दूसरे कमरे में जाता रहा। खाली-खाली  विशाल महल मुझे भयानक एहसास दे रहा था शायद यह उन कई कहानियों के कारण हो सकता है जो मैंने इस महल के बारे में पढ़ी और सुनी थीं। माना जाता है कि महल में भूमिगत तहखाने थे जहाँ रानी पद्मिनी और शाही महल में अन्य महिलाओँ  ने 1303 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के हमले के दौरान आग में कूदकर जौहर किया था। यह भी कहा जाता है कि उनकी आत्माएं अभी भी इस महल में भटक रहीं हैं। गाइड जो कहानियां अक्सर दोहराते हैं वह यह है कि कई बार मदद के लिए महिलाओं के रोने की आवाज़ सुनी जा सकती है।

 

सुनसान किले में डर का एहसास

 

सच पूछो  तो , मैं इन कहानियों को गंभीरता से नहीं लेता क्योंकि सनसनी बिकती है इसलिए मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि गाइड, व्लॉगर्स, ब्लॉगर ऐसी कहानियों को अपने वीडियो, ब्लॉग पर लोगों को आकर्षित करने के लिए बनाते हैं। जहाँ तक मेरा सवाल है कि मैं एक डरपोक प्राणी हूँ, मुझे किसी कहानी ने नहीं बल्कि महल के  विशाल खाली स्थानों ने  हिला दिया। 

बोलने  में बहुत आसान है कि डर के हीं आगे जीत हैं। … अरे जीत से पहले डर तो है। .. उसको कौन झेलेगा ? (यह तो किसी ने बोला नहीं  )

 

क्या यह प्रेतवाधित महल है?

 

अपनी पत्नी को अकेला छोड़कर मैं महल के पीछे की ओर बढ़ने लगा और विभिन्न पत्थर की सीढ़ियों पर कभी ऊपर चढ़ जाता तो कभी नीचे। सुनसान महल को अपने कमरे में कैद करने में लगा हुआ  था  और  तभी अचानक से  मैंने अपने  कैमरे के लेंस से कुछ चलता देखा, मेरे दिल की  धड़कन एक  पल के लिए मानो थम सी गयी हो ।

अकेले है…. तो क्या गम है

 

 मैं कैमरे  को ज़ूम  कर के  देखता रहा कुछ और  पल , दिल डर के मारे ज़ोर से धड़क रहा था , लेकिन फिर से कुछ नज़र नहीं आया। कुछ पल  कि  खमोशी  और मुझे  एक हलकी सी , बड़बड़ाहट की आवाज  सुनाई दी और फिर यह बंद भी  हो गया। अब तो  मुझे पसीना भी आने लगा था, मेरे हाथ गीले हो गए थे,मन में  एक ही प्रश्न  था,  जब महल  में कोई नहीं है तो यह आवाज या हलचल कैसे हो सकती है ? मैंने  सोचा की  यहाँ से भाग लेने  में ही भलाई है बेटा, जान बची सो लाखो पाये,तो बस मैं  जल्दी से उलटे पाँव आँगन कि ओर दौड़ा , और जैसे ही मुड़ा तो  गाउन में एक महिला की छाया देखी, अब तो  मेरे बेहोश होने की नौबत आ चुकी थी। उसी पल घबराहट में अगले पल  मैं  एक महिला से, टकरा गया और नीचे गिर गया और ऐसे में एक हाथ पीछे से  मेरे कंधे पर आता हैं और मुझे एक आवाज सुनाई दी “क्या तुम ठीक हो भाई”

सुनसान स्थान आपको पागल कर सकता है

 

मैं घूम गया और यह देखकर राहत महसूस की कि यह एक इंसान था। मैं सच  में  हिल गया था, हुआ यह था कि एक लड़का और दो लड़कियों ने किले में प्रवेश किया था और जब मैं तस्वीरें ले रहा था तो वे महल के पीछे की ओर चले गए थे इसलिए मैंने उन्हें देखा नहीं ।सुनसान  स्थान चाहे वो एक महल ही क्यों ना हो,  आपको पागल कर सकता है। लेकिन इस किस्से से  एक बात स्पष्ट है कि केवल कहानियाँ में ही भूत होते है न कि असल ज़िन्दगी में  होते हैं 

अब जब कोई महल में जोड़ीदार मिल गया तो मैं ने सोचा क्यों न  इनको बोलकर अपनी तस्वीर ही क्लिक करवा ली जाये।   

इसे कहते है राजा वाली फीलिंग का एहसास

 

चलो  अब आपको इस महल से जुडी  एक और प्रसिद्ध लोककथा सुनाता हूँ  और वह कहानी  है पन्ना धाई  की । कहानी इस तरह से है कि जब महाराणा उदय सिंह को सिंहासन के उत्तराधिकारी के रूप में घोषित किया गया तो उनके दुष्ट चाचा भानवीर ने उन्हें मारने की कोशिश की। जब पन्ना धाई  को इस बारे में पता चला तो उसने अपने बेटे चंदन को राजकुमार के बिस्तर में बदल दिया और राजकुमार उदय सिंह को फूलों से ढँकी टोकरी में छिपा दिया और सुनिश्चित किया कि वह महल से सुरक्षित बाहर निकल जाए।

 

महल में बने झरोखे

 

इस बीच भानवीर ने सोचा कि वह राजकुमार को मार रहा है और  पन्ना दाई के बच्चे को मार दिया। बलिदान की यह कहानी मेवार में अमर हो गई। केवल पन्ना दाई के बलिदान के कारण ही महाराणा उदय सिंह वर्षों बाद मेवाड़ को अपने चाचा से वापस जीतने में क़ामयाब हुए ।

 

एक अन्य प्रसिद्ध व्यक्तित्व मीरा बाई ने भी अपने जीवन का कुछ हिस्सा इस महल में बिताया था।

 

मैं इस महल से बहुत प्रभावित था और  हमने यहां लगभग 45 मिनट बिताए , इसलिए जैसे ही मैं महल से बाहर आया और अपने ऑटो पर पहुंचा, मैंने पाया कि मेरा ऑटो चालक गुस्से से लाल टमाटर जैसा हुआ जा रहा था और उसने मुझे फटकार लगाई  और बोला “अगर आप ऐसे ही टाइम लगाते रहे तो पूरा दिन निकल जायेगा और आप फिर भी पूरा किल्ला देख नहीं पायेंगे” खैर ऑटो चालक का इशारा कहो या  संदेश,  मुझे जोर से और स्पष्ट समझ आ गया  और मैंने  फैसला किया कि इसके बाद मैं थोड़ा जल्दी हो जाऊंगा। लेकिन मेरे दिल कि गहराई मे मैं जानता हूं कि यह आखिरी बार नहीं है जब मैं चित्तौड़गढ़ किला देख रहा हूं। मैं बहुत जल्द वापस आऊंगा, एक और मुलाकात  के लिए। 

हमारी यात्रा के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

 

अब हम अपने अगले गंतव्य मीरा मंदिर चले गए। अगले भाग के लिए बने रहें

 

 

कैसे पहुंचें राणा कुंभ पैलेस, चित्तौड़गढ़

सड़क मार्ग से: राणा कुंभ पैलेस चित्तौड़गढ़ किले में चित्तौड़गढ़ के केंद्र से 5 किमी की दूरी पर फोर्ट रोड पर स्थित है। रिक्शा, स्थानीय बस या टैक्सी से या पैदल चलकर यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।

 

रेल द्वारा: राणा कुंभा पैलेस दिल्ली, आगरा, मुंबई, चेन्नई, बीकानेर, पाली, जयपुर, अहमदाबाद जैसे प्रमुख शहरों के रेलवे स्टेशनों से निकटतम चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन (6 किमी) के माध्यम से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।

 

हवाई मार्ग से: राणा कुंभा पैलेस को निकटतम उदयपुर हवाई अड्डे (98 किमी) के माध्यम से पहुँचा जा सकता है जो दिल्ली, मुंबई के लिए नियमित घरेलू उड़ानों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।

 

 

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Hi, I am Aashish Chawla- The Weekend Wanderer. Weekend Wandering is my passion, I love to connect to new places and meeting new people and through my blogs, I will introduce you to some of the lesser-explored places, which may be very near you yet undiscovered...come let's wander into the wilderness of nature. Other than traveling I love writing poems.

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